कट्टेलनी चाची
डॉ.गोमा
सातगाँव, गुवाहाटी
आज 65 साल की उम्र में कट्टेलनी चाची का मर्म बुरी तरह से घायल हो गया। असह्य पीड़ा हुई। ऐसा आभास हुआ कि कोई कलेजे पर निरंतर कुल्हाड़ी मार रहा है। जब शादी हुई थी, तब उनकी उम्र महज 15 साल की थी। तबसे लेकर आज पर्यंत जिस संसारको अपनी मेहनत, ममता और सूझ-बूझ से सँवारा था, आज वही तहस-नहस होने को आमादा था। मातृ-वेदना की गहराई को मापने का कोई पैमाना नहीं होता। उनका अवसाद भरा चेहरा पारखियों के लिए किसी महाकाव्य से कम नहीं था। उन्होंने उड़ती नज़रों से अपने पति की ओर देखा। उनका चेहरा भी मलीन था। उनके अंदर भी व्यथा रूपी सुनामी की लहरें अपना क़हर बरपा रही है, यह साफ नज़र आ रहा था।
चार बेटे, संतान-रत्न। चारों की शादी हो चुकी थी। अब तक संयुक्त परिवार में गुजारा चल रहा था। सब कमाओ, मिल-बाँटकर खाओ, मुशीबत में साथ निभाओ – परिवार की गाड़ी इसी मंत्र के भरोसे चल रही थी। हल्की तनातनी, मनमुटाव, बहुओं के बीच शीतयुद्ध होते-होते स्थिति बेकाबू हो चली। चाची चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रही थी। उन्होंने आज तक जोड़ना सीखा था। पर इसके विपरीत परिवार टूटने की दिशा की ओर निरंतर अग्रसर हो रहा था। आज चारों अपनी खिचड़ी अलग पकाने को तैयार थे। सारी स्थितिको ताड़ते हुए चाची ने अपने पति से कहा – “हमें स्थिति काबू में रहते ही चारों में संपत्ति का बँटवारा कर देना चाहिए। हमारे पास अब यही एक रास्ता बचा है।
“ठीक कहा तुमने। शायद इस बिमारी का यही एकमात्र इलाज है। कल मैं पंचों को बुला लाता हूँ“ – व्यथा से भरे शब्दों में कट्टेल चाचा बोले।
पारिवारिक बँटवारे को अंजाम देने के लिए कट्टेलनी चाची के आँगन में पंचायत बैठी। चल-अचल संपत्ति जो भी थी, चारों में बराबर की अनुपात में बँट गई। पुस्तैनी जमीन में कागजी सीमारेखा खिंची गई। सीमा कागज में खिंची जा रही थी, पर कलम से खिंची जा रही हर रेखा शूल की भाँति चाची के मर्म में चुभ रही थी। वे चुपचाप यह दर्द सहने को बाध्य थीं।
संपत्ति के बँटवारे के बाद पंचायत प्रधान ने चाची की ओर देखते हुए कहा – “चाची, संपत्ति का बँटवारा हो गया। अब बताइए शेष जिंदगी बिताने के लिए किस बेटे-बहू का चुनाव करेंगी? किनके साथ रहना चाहेंगी?”
इस प्रश्न से चाची की तन्द्रा जैसे भंग हो गई। यह एक प्रश्न न होकर मानो उनके लिए एक करारा तमाचा था, जिसके प्रहार से जैसे उनका पूरा तन-बदन झनझना उठा हो। यथार्थ के खुरदरे धरातल पर आते ही उनका हृदय हाहाकार करने लगा। जिन्हें आज तक ममता की छाँव में बड़े यत्न से संभालकर रखा, उन मोतियों का चुनाव करने के दिन भी आएँगे, ऐसा चाची ने कभी सोचा भी न था। ऐसा लग रहा था मानो कोई उनका आँचल तार-तार कर रहा है। मुँह से एक शब्द नहीं फूटा। वे सजल नेत्रों से पास में बैठे हुए अपने बेटों और बहुओं की ओर टुकुर-टुकुर देखने लगीं।
वातावरण में छाई निस्तब्धता को भंग करते हुए प्रधान ने दुबारा पूछा – “बताइए चाची आप और चाचा किसके साथ रहना पसंद करेंगे?”
कुछ पल मौन रहने के बाद बड़े बेटे ने मझले की ओर देखते हुए कहा – “तुम्हारी नौकरी भी है, अम्मा-बाउजी को तुम रख लो।“
‘मैं क्यों? मेरे तीन-तीन बच्चे हैं। अभी आय भी कम है। तुम रखो।’- मझले ने तपाक से उत्तर देते हुए अपना फैसला सुनाया।
“युद्धवीर और मानवीर की बातें समझ में आ गई। कर्मवीर, तुम क्या कहते हो ?”- प्रधान ने तीसरे बेटे की ओर लक्ष्य करते हुए पूछा।
कर्मवीर और उसकी पत्नी कुछ मिनट तक दूर जाकर कुछ देर तक आपस में फुसफुसाते रहे। जब वापस आकर अपने स्थान पर बैठ गए, तो पंच प्रधान ने सहज भाव से प्रश्न दोहराया।
‘मैं तो विदेश जा रहा हूँ। आपकी बहू के पाँव भी भारी हैं। मुझे उसे मायके में छोड़कर जाना पड़ेगा। इस स्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ, आपलोग ही बता दीजिए।“ – तीसरे बेटे ने परोक्ष रूप में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
प्रधान ने छोटे बेटे और बहू को लक्ष्य करते हुए कहा – ‘‘तुम दोनों क्या कहते हो?’’
“मैं तो फौजी ठहरा। सरकारी आदेश का गुलाम। कब, कहाँ के लिए निकलने का आदेश मिले, इसका कोई ठिकाना नहीं है। इस हालात में मैं अपने बूढ़े माँ-बाउजी को कहाँ-कहाँ ले फिरूँगा। मेरी मज़बूरी को समझने का प्रयास करें।”
अपने बेटों की मजबूरी से भरे एक-एक शब्दों की रस्सी से कट्टेलनी चाची का कलेजा ऐँठता जा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उनका दम घुटने वाला है। सबके चेहरों को पढ़ने के प्रयास में उन्होंने अपने बेटे और बहुओं की ओर देखा। किसी भी चेहरे में उगते सूरज की नर्म किरणें नहीं दिखाई दे रही थी। सबमें गोधूली साँझ की बढ़ती कालिमा साफ नज़र आ रही थी।
कट्टेलनी चाची ने कभी अपनी ममता को बाँटने में कोई भेद-भाव नहीं किया। सब पर बराबर लुटाया। सबकी सुरक्षा की चिंता में वे अपनी आयु के तीसरे दहलीज तक आई। खुद की खुशियाँ भुल गईं, संतान को कभी उदास होने नहीं दिया। स्वयं आधे पेट से गुजारा किया, बच्चों को कभी भूखा नहीं रखा। खाना खाते वक्त जब पतीला खाली हो जाता तो कोई पूछता – “माँ तुम क्या खाओगी ?” -तो हँसते हुए कहती – “मैंने पड़ोस की मीना के यहाँ दिन ढले कुछ खाया था, मुझे बिल्कुल भी भूख नहीं है” – कहते हुए उनका चेहरा ऐसे खिल उठता, सुनने वाले को पता ही नहीं चलता कि वे भूखे पेट रात गुजारने जा रही हैं। चाचा जब यह ताड़ जाते कि पतीले में खाना कम है, तो कहते – “तुम लोग खा लो आज मुझे भूख नहीं है।“ उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की।
एक जोड़े कपड़े से साल गुजारा लेकिन कट्टेल दंपति ने बेटों को कोई कमी नहीं होने दी। धूप, वर्षा आँधी की परवाह किए बिना ब्रह्मपुत्र नदी किनारे की खेती में मेहनत करते रहे। बेटे स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करते रहे। इस परिवारिक उन्नति में पति की जिम्मेदारी का भार बाँटने में चाची ने कम प्रयास नहीं किया। घर में गाय पाला। गोबर उठाया। शीत, गर्मी, सर्दी की परवाह किए बिना आस-पास की पहाड़ियाँ, जंगल, खेतों की मेड़ें आदि स्थानों में जाकर गायों के लिए चारा तलाशा। गाय का चारा-भूसा खरीदने स्वयं बाजार गई। अपनी पीठ पर बोझ उठाया। होटलों में दूध बेचकर बेटों की पढ़ाई के लिए पैसों का जुगाड़ किया। जब बेटे अच्छे अंकों में पास होने का समाचार ले आते उनके सारे कष्ट छूमंतर हो जाते। इस प्रकार कट्टेल दंपति का सर समाज में ऊँचा उठता चला गया।
आज दोनों के मन में जोरदार भूकंप चल रहा है। कलेजा जैसे खंड-खंड हो रहा है। पंचायत अब तक कोई निर्णय नहीं सुना पाई। बेटों की मजबूरी के दुखड़ों की छेद में निर्णय का पेंच अटक गया था। चाची को लगा अब पंचायत उनके चारों बेटों को दोषी करार देगी। वे प्रधान पंच के कुछ कहने से पहले अपने कलेजे पर पत्थर रखते हुए सबके सामने विनय की मुद्रा में खड़ी होकर कहने लगीं –
“आप लोगों ने हमारे घर में आने का कष्ट उठाकर हम पर बड़ी कृपा की है। इसके लिए मैं पंचको विशेष धन्यवाद देती हूँ। आज फैसला नहीं हो पाया। इस विषय में आज रात को हम फिर पारिवारिक विचार-विमर्श करेंगे। उसके बाद आप लोगों को सूचित करेंगे।“
चाची के इन शब्दों के साथ पंचायत बर्खास्त हो गई। पंच परमेश्वर घर चले गए।
पीड़ा बाँटने पर नहीं बँटती। इस प्रयास में और घनी हो जाती है। चाचा-चाची को स्थिति का आभास हो गया। बेटे और बहू सब मौन थे। यह मौनता भी बहुत कुछ बयाँ कर रही थी। इस खामोशी के आइने में भविष्य का प्रतिबिंब साफ नज़र आ रहा था।
दिए गए वचन के अनुसार अगले दिन पंचों को चाची ने बताया – “मेरे चारों बेटे किसी न किसी मजबुरी में जी रहे हैं। अपने माता-पिता को लेकर वे परेशान न हों। हम अपने बनाए इसी पुराने घर में रहेंगे। अभी हाथ-पाँव चल रहे हैं। कोई समस्या नहीं है। बेटे हम दोनों को अपने साथ रखने में असमर्थ हैं लेकिन हम दोनों पूरे परिवार को साथ रखने में समर्थ हैं। इसलिए हम दोनों ने यह निर्णय लिया कि हम किसी पर बोझ नहीं बनेंगे। हमारे बेटे-बहू कभी भी हमारे पास आ सकते हैं। इससे हमें बड़ी खुशी मिलेगी।
कट्टेलनी चाची ने पल-पल दस्तक दे रहा बुढापा कल किस लाठी के सहारे कटेगा – इस प्रश्न को अंजान भविष्य के हाथों में सौंप दिया। मन की पीड़ा मन में छुपाते हुए होंठों पर मुस्कान खिलाने वाली चाची ने खुदको हर चुनौती झेलने के लिए तैयार कर लिया। कट्टेल दंपती के इस निर्णय से उनके बहू-बेटों को क्या मिला, यह नहीं कह सकते लेकिन उन असहाय माता-पिता को जीने का हौसला जरूर मिल गया, जो बिना किसी सहारे अपना बुढ़ापा काट रहे थे।
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